Wednesday, May 17, 2017

प्राकृतिक आपदा एवं उनका प्रबंधन

आपदा, प्राकृतिक आपदा एवं उनका प्रबंधन
आपदा एक प्राकृतिक या मानव निर्मित जोखिम का प्रभाव है जो समाज या पर्यावरण को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है आपदाशब्द ज्योतिष विज्ञान से आया है इसका अर्थ होता है कि जब तारे बुरी स्थिति में होते है तब बुरी घटनाये होती हैं.
समकालीन शिक्षा में, आपदा अनुचित प्रबंधित जोखिम के परिणाम के रूप में देखा जाता है. ये खतरें आपदा और जोखिम के उत्पाद है. आपदा जो कम जोखिम के क्षेत्र में होते हैं वे आपदा नही कहे जाते हैं जैसे निर्जन क्षेत्र में. विकाशशील देश आपदा का भारी मूल्य चुकाते हैं- आपदा के कारण ९५ % मौत विकासशील देशों में होती है और प्राकृतिक आपदा से होने वाली मौत औद्योगिक देशों की तुलना में विकाशशील देशों में २० गुना ज्यादा हैं. आपदा को निम्न प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है -एक दुखद घटना, जैसे सड़क दुर्घटना, आग, आतंकवादी हमला या विस्फोट, जिसमें कम से कम एक पीड़ित व्यक्ति हो.
एक प्राकृतिक आपदा एक प्राकृतिक जोखिम(natural hazard) का ही परिणाम है (जैसे की ज्वालामुखी विस्फोट (volcanic eruption), भूकंप, या भूस्खलन (landslide)) जो कि मानव गतिविधियों को प्रभावित करता है.मानव दुर्बलताओं को उचित योजना और आपातकालीन प्रबंधन (emergency management) के आलोक में और बढ़ा देता है, जिसकी वजह से आर्थिक, मानवीय और पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है. इसके परिणाम स्वरुप होने वाली हानि जनसँख्या की आपदा को बढ़ावा देने या विरोध करने की क्षमता पर निर्भर करती है अर्थात उनके लचीलेपन पर. ये समझ केंद्रित है इस विचार में: "जब जोखिम और दुर्बलता (vulnerability) का मिलन होता है तब दुर्घटनाएं घटती हैं". जिन इलाकों में दुर्बलताएं निहित न हों वहां पर एक प्राकृतिक जोखिम कभी भी एक प्राकृतिक आपदा में तब्दील नहीं हो सकता है, उदहारण स्वरुप, निर्जन प्रदेश में एक प्रबल भूकंप का आना.बिना मानव की भागीदारी के घटनाएँ अपने आप जोखिम या आपदा नहीं बनती हैं, इसके फलस्वरूप प्राकृतिक शब्द को विवादित बताया गया है. हाल ही में भारत के उत्तरी राज्यों में घटित बाढ़ और भूस्खलन की घटना ने प्राकृतिक आपदाओं के स्वरूप पर बहस को और गंभीर बना दिया है .
ये आपदाएं मानव निर्मित थी अथवा प्राकृतिक इस पर बहस भले ही की जा रही हो परन्तु इस बात से किसी को संदेह नहीं की आपदा पश्चात के प्रबंधन की मानवीय तथा अन्य भौतिक क्षति को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है . कुदरत के कहर से भारी तबाही का सामना कर रहे उत्तराखंड के पास इस आपदा से निपटने के लिए कोई आपदा प्रबंधन योजना ही नहीं थी। अपनी सरंचना के कारण हमेशा ही प्राकृतिक आपदाओं के खतरे से घिरे रहने वाले इस राज्य की ओर से इन आपदाओं से निपटने के लिए कोई पुख्ता तैयारी नहीं की गई थी। कैग द्वारा हाल ही में 23 अप्रैल को जारी एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि अक्टूबर 2007 में गठित स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी की आज तक कोई बैठक तक नहीं हुई है और न ही इस अथॉरिटी ने अब तक आपदा से निपटने के लिए कोई नियम-कानून या दिशानिर्देश ही बनाए हैं।
राज्य की आपदा प्रबंधन तंत्र की तरफ इशारा करते हुए कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि नियमों के अनुसार आपदा के समय उससे निपटने की तैयारी की जिम्मेदारी आपदा प्रबंधन तंत्र की होती है। लेकिन इस मामले में 'राज्य की अथॉरिटीज पूरी तरह से निष्क्रय थीं।' राज्य आपदा प्रबंधन प्लान निर्माणाधीन था और कई आपदाओं के लिए कोई योजना ही नहीं बनाई गई।
क्या आपदा पूर्व चेतावनियों पर अमल करके उत्तराखंड के ऊपरी इलाकों को तबाही से बचाया जा सकता था। कैग की रिपोर्ट में कहा गया है कि पहले से जारी चेतावनियों पर अमल करने के बारे में कोई योजना नहीं बनाई गई थी। 'संचार व्यवस्था अपर्याप्त थी। यह लपरवाही तब और भी चौंकाने वाली बन जाती है जबकि वर्ष 2007-8 और 2011-12 के बीच राज्य में 653 लोगों ने प्राकृतिक आपदाओं में अपनी जानें गंवाईं। इनमें से 55 प्रतिशत लोगों की मौत भूस्खलन और तेज बारिश की वजह से हुई। इस अवधि के दौरान राज्य में 27 बड़े भूस्खलन की घटनाएं हुईं। अकेले वर्ष 2012 में 176 लोगों की मौत प्राकृतिक आपदा के कारण हुई।
साथ ही कैग की रिपोर्ट में राज्य आपदा राहत कोष के धन के इस्तेमाल में भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों की तरफ इशारा किया गया है। इसमें कहा गया है कि राज्य सरकार ने प्राकृतिक आपदा की सलाना रिपोर्ट तक तैयार नहीं की और नहीं उसने इस बात जानकारी दी की राहत कोष के फंड का इस्तेमाल कैसे किया गया। नतीजा वर्ष 2007-11 के दौरान केंद्र सरकार द्वारा फंड जारी करने में 80 दिन से लेकर 184 दिनों की देरी हुई।
उत्तराखंड सरकार के कुप्रंबधन का उदाहरण देते हुए कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने जून 2008 में राज्य के 101 गांवों को असुरक्षित करार दिया था लेकिन आज तक राज्य सरकार ने उस गांव के लोगों के लिए पुर्नवास की योजना नहीं बनाई।
भारत में लोगों को आपदासे बचाना या तत्काल राहत देना किसकी जिम्मेदारी है?. दरअसल आपदा प्रबंधन तंत्र की सबसे बड़ी आपदा यह है कि लोगों को कुदरती कहर से बचाने की जिम्मेदारी अनेक की है और किसी एक की नहीं।
इस देश में जब लोग बाढ़ में डूब रहे होते हैं, भूकंप के मलबे में दब कर छटपटाते हैं या फिर ताकतवर तूफान से जूझ रहे होते हैं, तब दिल्ली में फाइलें सवाल पूछ रही होती हैं कि आपदा प्रबंधन किसका दायित्व है? कैबिनेट सचिवालय? जो हर मर्ज की दवा है। गृह मंत्रालय? जिसके पास दर्जनों दर्द हैं। प्रदेश का मुख्यमंत्री? जो केंद्र के भरोसे है। या फिर नवगठित राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण? जिसे अभी तक सिर्फ ज्ञान देने और विज्ञापन करने का काम मिला है। एक प्राधिकरण सिर्फ 65 करोड़ रुपये के सालाना बजट में कर भी क्या सकता है। ध्यान रखिए कि इस प्राधिकरण के मुखिया खुद प्रधानमंत्री हैं।
जिस देश में हर पांच साल में बाढ़ 75 लाख हेक्टेयर जमीन और करीब 1600 जानें लील जाती हो, पिछले 270 वर्षो में जिस भारतीय उपमहाद्वीप ने दुनिया में आए 23 सबसे बड़े समुद्री तूफानों में से 21 की मार झेली हो और ये तूफान भारत में छह लाख जानें लेकर शांत हुए हों, जिस मुल्क की 59 फीसदी जमीन कभी भी थरथरा सकती हो और पिछले 18 सालों में आए छह बड़े भूकंपों में जहां 24 हजार से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हों, वहां आपदा प्रबंधन तंत्र का कोई माई-बाप न होना आपराधिक लापरवाही है।
सरकार ने संगठित तौर पर 1954 से आपदा प्रबंधन की कोशिश शुरू की थी और अब तक यही तय नहीं हो सका है कि आपदा प्रबंधन की कमान किसके हाथ है। भारत काआपदा प्रबंधन तंत्र इतना उलझा हुआ है कि इस पर शोध हो सकता है। आपदा प्रबंधनका एक सिरा कैबिनेट सचिव के हाथ में है तो दूसरा गृह मंत्रालय, तीसरा राज्यों, चौथा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन या फिर पांचवां सेना के। समझना मुश्किल नहीं है कि इस तंत्र में जिम्मेदारी टालने के अलावा और क्या हो सकता है। गृह मंत्रालय के एक शीर्ष अधिकारी का यह कहना, 'आपदा प्रबंधन तंत्र की संरचना ही अपने आप में आपदा है। प्रकृति के कहर से तो हम जूझ नहीं पा रहे, अगर मानवजनित आपदाएं मसलन जैविक या आणविक हमला हो जाए तो फिर सब कुछ भगवान भरोसे ही होगा..', भी यही जाहिर करता है।
उल्लेखनीय है कि सुनामी के बाद जो राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण बनाया गया था, उसका मकसद और कार्य क्या है यही अभी तय नहीं हो सका है। सालाना पांच हजार करोड़ से ज्यादा की आर्थिक क्षति का कारण बनने वाली आपदाओं से जूझने के लिए इसे साल में 348 करोड़ रुपये मिलते हैं और काम है लोगों को आपदाओं से बचने के लिए तैयार करना। पर बुनियादी सवाल यह है कि आपदा आने के बाद लोगों को बचाए कौन? यकीन मानिए कि जैसा तंत्र है उसमें लोग भगवान भरोसे ही बचते हैं।
आपदा प्रबंधन का हाल
इन सबों के बीच हमें गुजरात से आपदा प्रबंधन सीखना चाहिए जहां बीस मीटर की गहराई में दबे इंसान की धड़कन सुनने वाला यंत्र, गोताखोरों को लगातार 12 घंटे तक आक्सीजन देने वाला ब्रीदिंग सिस्टम, अंडर वाटर सर्च कैमरा, आधुनिक इन्फेलेटेबल बोट, हाई वाल्यूम वाटर पंपिंग..। आप सोच रहे होंगे कि यह किसी विकसित देश के राहत दल की तकनीकी क्षमता का ब्यौरा है। जी नहीं! यह और ऐसी तमाम क्षमताएं व विशेषज्ञताएं इसी देश के एक राज्य, गुजरात में मौजूद हैं और इन्हीं के बूते आपदाप्रबंधन के मामले में गुजरात विकसित देशों से मुकाबले की स्थिति में आ गया है।
सोलह सौ किलोमीटर से अधिक के समुद्री किनारे तथा भूकंप के मामले में सक्रिय अफगानिस्तान से प्लेट जुड़ा होने के कारण गुजरात पर हमेशा आपदाओं का खतरा बना रहता है। लेकिन गुजरात ने आपत्ति को अवसर में बदलते हुए आपदा प्रबंधन में एक अनोखी दक्षता हासिल की है। आज गुजरात की यह विशेषज्ञता व उपकरण बिहार के बाढ़ पीड़ितों की जान बचा रहे हैं। मुख्य फायर आफिसर एम.एफ. दस्तूर बताते है कि इजरायल का एक्वा स्टिक लिसनिंग डिवाइस सिस्टम उनकी आपदा टीम की धड़कन है। यह उपकरण जमीन के नीचे बीस मीटर की गहराई में दबे किसी इसान के दिल की धड़कन तक सुन लेता है। मोटर वाली जेट्स्की बोट और गोताखोरों को लगातार 12 घटे (आम ब्रीदिंग सिस्टम की क्षमता 45 मिनट तक आक्सीजन देने की है) तक आक्सीजन उपलब्ध कराने वाला अंडर वाटर ब्रीदिंग एपेरेटस भी सरकार के पास हैं।
यहां का आपदा प्रबंधन तंत्र आधुनिक मास्क, इन्फ्लेटेबल बोट, हाई वाल्यूम पंपिंग यूनिट आदि आधुनिक उपकरणों से लैस है। यहां आपदा प्रबंधन दल के पास नीदरलैंड का हाइड्रोलिक रेस्क्यू इक्विपमेंट भी है, जो मजबूत छत को फोड़ कर फर्श या गाड़ी में फंसे व्यक्ति को निकालने का रास्ता बनाता है। सरकार ने अग्निकांड से निपटने के लिए बड़ी संख्या में अल्ट्रा हाई प्रेशर फाइटिग सिस्टम भी खरीदे हैं। आम तौर पर आग बुझाने में किसी अन्य उपकरण से जितना पानी लगता है, यह सिस्टम उससे 15 गुना कम पानी में काम कर देता है। इसे अहमदाबाद के दाणीलीमड़ा मुख्य फायर स्टेशन ने डिजाइन किया है। यह आग पर पानी की एक चादर सी बिछा कर गर्मी सोख लेता है।
अमेरिका के सर्च कैमरे तथा स्वीडन के अंडर वाटर सर्च कैमरे भी सरकार ने अपनी राहत और बचाव टीमों को दिए हैं। ये उपकरण जमीन के दस फीट नीचे तथा 770 फीट गहरे पानी में भी तस्वीरे उतार कर वहां फंसे व्यक्ति का सटीक विवरण देते हैं। अमरीका की लाइन थ्रोइंग गन से बाढ़ में या ऊंची बिल्डिंग पर फंसे व्यक्ति तक गन के जरिए रस्सा फेंक कर उसे बचाया जा सकता है। राज्य की एम्बुलेंस सेवा 108 ने तो गंभीर वक्त पर बहुत अच्छे परिणाम दिए है। अब गुजरात में कहीं भी पंद्रह मिनट में एम्बुलेंस सेवा प्राप्त की जा सकती है। गुजरात ने महज एक वर्ष के भीतर भूकंप की विनाशलीला का कोई चिह्न नहीं रहने दिया.
वर्तमान में आपदा प्रबन्धन का सरकारी तंत्र देखें ता कैबिनेट सचिव, गृहमंत्रालय, राज्यों में मुख्यमंत्री, राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन विभाग और सेना इस तंत्र का हिस्सा हैं। यह भी सच है कि हमारे देश में आपदा प्रबन्धन की स्थिति ज्यादा ही लचर है। हमारे आपदा प्रबन्धन की कमजोर कड़ी लगभग हर आपदा में ढीली दिखी, लकिन हमने उसे मजबूत करन का प्रयास नहीं किया। मीडिया की भाषा में यह ‘प्रशासनिक लापरवाही’ अथवा न्यायपालिका की भाषा में ‘आपराधिक निष्क्रियता’ है। प्रभावी आपदा प्रबन्धन की पहली शर्त है जागरूकता और प्रभावित क्षेत्रा में तत्काल राहत एजेन्सी की पहुंच। यदि लोगों में आपदा की जागरूकता नहीं है तो तबाही भीषण होगी और राहत में दिक्कतें आएंगी। आपदा सम्भावित क्षेत्र में तो लोगों को बचाव की बुनियादी जानकारी देकर भी आपदा से होने वाली क्षति को कम किया जा सकता है। आपदा प्रबन्धन के बाकी तत्वों में ठीक नियोजन, समुचित संचार व्यवस्था, ईमानदार एवं प्रभावी नेतृत्व, समन्वय आदि काफी महत्वपूर्ण हैं। हमारे देश में व्यवस्था की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि यहां सब-एक दूसरे पर जिम्मेवारी डालते रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक औसतन 5 से 10 हजार करोड़ की आर्थिक क्षति तो प्रतिवर्ष प्राकृतिक आपदाओं से उठाते हैं लकिन इससे जूझन के लिये आपदा प्रबन्धन पर हमारा बजट महज 348 करोड़ रुपये है। इस धनराशि में अधिकांश प्रचार आदि पर ही खर्च हो जाता है। प्रशिक्षण की अभी तो तैयारी भी नहीं है। वर्ष 2005 में आपदा प्रबन्धन अधिनियम संसद ने पारित कर दिया है। इसके बाद से ही राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन प्राधिकरण का गठन किया गया है.
गुजरात भूकम्प के बाद वहां विकसित प्रभावी आपदा प्रबन्धन तंत्र एक मिसाल है। इस मॉडल को अन्य राज्य सरकारें अपना सकती हैं। इस समय गुजरात आपदा प्रबन्धन विभाग को विश्वस्तरीय आपदा प्रबन्ध्न संस्था के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यदि ऐसा है, तो अन्य राज्य सरकारों को भी अपना आपदा प्रबन्धन तंत्र मजबूत और प्रभावी बनाना चाहिए। बाढ़ प्रभावित इलाके में स्थानीय मदद से प्रत्येक गांव या दो-तीन गांवों पर एक आपदा राहत केन्द्र की स्थापना कर वहां दो-तीन महीन का अनाज, पर्याप्त साधन, जरूरी दवाएं, पशुओं का चारा, नाव, तारपोलीन व अन्य जरूरी चीजों का बाढ़ से पूर्व ही इन्तजाम सुनिश्चित किया जाना चाहिए। आज की सबसे बड़ी जरूरत है देश भर के इंजीनियरों, डाक्टरों, अफसरों, जनप्रतिनिधियों का ऐसी प्रशिक्षण दी जाए जो विषम से विषम परिस्थितियों में भी मजबूत मनोबल व पूरी क्षमता से कार्य कर सके । इस कार्य में अन्य स्वयंसेवी संगठनों, एनसीसी, एनएसएस, विविल डिफेंन्स, होमगार्ड, कालेज छात्रों को भी शामिल किया जाना चाहिए। आपदा प्रबन्धन में लापरवाही को राष्ट्रीय अपराध घोषित किया जाना चाहिए। हमें यह समझना ही होगा कि आपदा प्रबंधन की अनुपस्थिति समस्त उपलब्धियों पर पानी फेर सकती है।
Note:- भारत में आपदा प्रबंधन के विधिक ढांचे के विषय में और जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें http://mha.nic.in/hindi/pdfs_hin/NPDM%28H%29150110.pdf
Raghubir Singh Gadegawnliya Raigar

Tuesday, May 16, 2017

एक पुलिस ऑफिसर के द्वारा क्राइम सीन पे सबसे पहले करनेवाले काम


सिन ऑफ़ क्राइम पे पहुचने के बाद सबसे इम्पोर्टेन्ट कार्य रहता है, क्राइम सिन को सुरक्षित रखने का, वह है की क्राइम सिन कम से कम दूषित और जहा तक संभव हो फिजिकल एविडेंस को किसी भी स्तिथि में डिस्टर्ब होने से बचाया जाय !क्राइम का खबर मिलने के बाद एक पुलिस अधिकारी को तत्परता और एक प्रोफेशनल वे से काम करना चाहिए ! घटना के जगह पे पहुचने के उपरान्त उन्हें घटना को अस्सेस करना चाहिए और घटना स्थल को एक क्राइम सिन मान के काम करना चाहिए !

घटना स्थल पे पहुचने वाले पुलिस अधिकारी को तत्परता के साथ साथ सावधानी पूर्वक सिन ऑफ़ क्राइम के पास जाना या इंटर करना चाहिए! उन्हें चौकना और ध्यान रखना चाहिए सिन ऑफ़ क्राइम के पास अगर कोई व्यक्ति, वाहन , कोई और घटना वह हो रहा हो, मेन एविडेंस और घटना स्थल के पास के वातावरण के ऊपर  ! 

इनिशियल रेस्पोंडिंग पुलिस ऑफिसर  को करना चाहिए :
घटना स्थल का विबरण जैसे की पता, लोकेशन, टाइम, तारीख, टाइप ऑफ़ कॉल, पार्टीज इन्वोल्व.
चौकना रहे अगर कोई व्यक्ति या वाहन घटना स्थल से भाग रहा  है तो रोके!
सावधानीपूर्वक सिन ऑफ़ क्राइम पे जाये , पूरी एरिया को गहन तरीके से मुयैना (स्कैन) करे!
क्राइम सिन का अवलोकन करे!
कोई वहान या व्यक्ति क्राइम सिन के पास मिले तो सावधानी पूर्वक जाँच करे कही हो सकता है वो व्यक्ति या वाहान क्राइम में समिल्लित हो !
प्राम्भिक आवलोकन में देखना, सुनना, और स्मेल लेने का सेन्स का इस्तेमाल करे और अपनी और दुसरे व्यक्तियों की सुरक्षा को सुनिश्चित कर के ही सिन ऑफ़ क्राइम के नजदीक जाये !
सवधान और सतर्क रहे ये समझे  की क्राइम अभी भी जरी है !

दुसरे शब्दों में कहे तो क्राइम सिन पे पहले पहुचने वाली पुलिस ऑफिसर को बहुत ही observant होना चाहिए क्राइम सिन के एंट्री , एग्जिट और एप्रोच करते हुवे.

सुरक्षा प्रोसीजर

फर्स्ट रेपोंडिंग पुलिस ऑफिसर की पहली प्राथमिकता अपनी,अपनी साथियों और क्राइम सिन पे मौजूद दुसरे लोगो का सुरक्षा होनी चाहिए! फर्स्ट रेपोंडिंग पुलिस ऑफिसर को घटना स्थल पे पहुचते ही खतरा को पहचाना और सिचुएशन को कण्ट्रोल करना चाहिये.

फर्स्ट रेपोंडिंग पुलिस ऑफिसर को सेफ्टी के लिए करना चाहिए:

अपनी और अपने साथियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करना चाहिए!
क्राइम सिन के मुयाने के दौरान किसी लाइट , साउंड या स्मेल जो की वहा पे मौजूद व्यक्ति को नुकशान पंहुचा सकता है को विशेष ध्यान देना चाहिए.खतरनाक पदार्थ जैसे, केरोसिन तेल, डीसेल, पेट्रोल या कोई ऐसा केमिकल जो  ख़तरना हो सकता है उसके सावधानी पूर्वक वह से अलग करा देना चाहिए!
कोई ऐसा केमिकल पदार्थ  जिसे केवल प्रशिक्षित व्यक्ति ही हटा सकता है तो उसे कंसर्न डिपार्टमेंट को सूचित करना चाहिए. अपने  द्वारा उठाने का कोशिश नहीं करना चाहिए!
घटना स्थल को अप्रोच करते हुवे अपने सुरक्षा के साथ विक्टिम, विटनेस, और अन्य लोगो का ध्यान रखे!
सिन ऑफ़ क्राइम को सुर्वे करे और कोई dangerous व्यक्ति वहा है तो उसे कण्ट्रोल करे!
अगर सिचुएशन कण्ट्रोल में नहीं आ रहा है तो अपने से सेनियर अधिकारी को सूचित करे और बैकअप मांगे!
Emergency Care

सिचुएशन को अंडर कण्ट्रोल  में लाने के बाद फर्स्ट रेस्पोंडिंग ऑफिसर का काम है की  निश्चित करे के घायल लोगो को मेडिकल सुबिधा मिले और उस दौरन ये भी ध्यान रखे की कोई वाइटल एविडेंस को नुकशान ना पहुचे और दूषितट न हो पाए!

फर्स्ट रेस्पोंडिंग ऑफिसर का काम है :
अगर कोई घायल है उसे देखे और जल्द से जल्द मेडिकल हेल्प की व्यस्था करे !
मेडिकल टीम और एम्बुलेंस को बुलाये
मेडिकल टीम को बताये की मेडिकल हेल्प देते समय ध्यान रखे की क्राइम सिन में कोई अल्टरेशन न हो .
मेडिकल टीम को मुख्य एविडेंस के बारे में बताये और बोले की उसको कम से कम छुए !
सुनिश्चित करे की मेडिकल टीम विक्टिम का वस्त्र और पर्सनल इफ़ेक्ट को यथा स्तिथि बनाये रखे कपडे के बुलेट होल या कोई कट मार्क को फाडे नहीं !
मेडिकल टीम को आगाह करे की सिन ऑफ़ क्राइम को साफ ना करे और कोई सामान यहाँ से न ले जाये !
अगर आप के आने से पहले मेडिकल टीम आ गयी है तो उनका नाम और पता , कांटेक्ट नंबर सब लेले.
अगर आप को लगता है की घायल विक्टिम मर सकता है तो उसका डाईंग डिक्लेरेशन लेने का कोशिश करे !
सिन ऑफ़ क्राइम पे विक्टिम, सस्पेक्ट, या विटनेस के द्वारा कोई भी बयान दिया गया है तो उसे डॉक्यूमेंट करे !
अगर विक्टिम को किसी हॉस्पिटल में रेफेर किया है तो उसके साथ एक पुलिसवाले को भेजे !

सिन ऑफ़ क्राइम पर इकठ्ठा हुए लोगो को सिक्योर और कण्ट्रोल

कण्ट्रोल करना , पहचान करना और ओगो को सिन ऑफ़ क्राइम से हटाना और सिन ऑफ़ क्राइम को सुरक्षित रखने के लिए कम से कम लोगो का मूवमेंट सिन ऑफ़ क्राइम के पास होना चाहिए.इसलिए फर्स्ट रेस्पोंडिंग ऑफिसर को चाहिए की:
सिन ऑफ़ क्राइम के पास जो लोग है उन्हें कण्ट्रोल करे और उन्हें सिन ऑफ़ क्राइम को डिस्टर्ब करने या डिस्ट्रॉय करने से रोके!
सिन ऑफ़ क्राइम के पे मौजूद लोगो को पहचाने और सस्पेक्ट और वीनस को सिक्योर और सेपरेट करे !
आजू बाजु खड़े लोगो को देखे और पहचाने की क्या ये विटनेस हो सकता है यदि हा तो उसे सिक्योर और सेपरेट करे और बाकि लोगो को वह से हटाने का कोशिश करे !
हटाने का एक कारगर तरीका जो आम तौर पर पुलिस इस्तेमाल करती है वो है की आजू बाजु खड़े लोगो का विडियोग्राफी /फोटोग्राफी करना और उनका नाम और एड्रेस लिखने से बहुत बार देखा गया है की भीड़ सिन ऑफ़ क्राइम से भाग जाती है !
जरुर पढ़े :ड्यूटी ऑफ़ फर्स्ट रेस्पोंडिंग ऑफिसर

बरिकाडिंग/ सेकुरिंग सिन ऑफ़ क्राइम

बाउंडरी बनाते समय मेन पॉइंट से शुरु करते हुवे आउटवर्ड जाना चाहिए जिसमे की ये सब कवर हो जाय :
जगह जहा पे क्राइम हुवा है
सस्पेक्ट और विटनेस  का एंट्री और एग्जिट का रास्ता !
वो जगह जहा विक्टिम/एविडेंस को मूव कर के रखा है !इसमें कही कोई ट्रेस और इम्प्रैशन हो उसे भी कवर करे !
फिजिकल बैरियर यानि टेप या रस्सी से लगाये जिससे की कोई अनावश्यक लोग वह न जा सके अगर सिन ऑफ़ क्राइम कोई मकान है तो उसे लॉक और सिल करे !
फुटस्टेप, टायर मार्क और ऐसी कोई मार्क जो धुप, वरिश या हवा से नस्त हो सकती है उसे बचाना का वेवस्था करे!

सिन ऑफ़ क्राइम पे एविडेंस को बचाना का बरिकडिंग एक अहम् काम करता है

6 कॉमन गलतिया अक्सर एक आई ओ सीन ऑफ़ क्राइम पे करता है

"If your life is free of failures you're not taking enough risks"
आज कल आप देखते होंगे की छोटा अपराध हो या बड़ा मीडिया कितना हो हल्ला मचा है और पल पल की बारीक़ खबरे एक एक कर पराशरित  करते रहता है लेकिन ये समझ लेना चाहिए माडिया चिल्लाये या कोई कितना हल्ला मचाये जो भारतीय नयायपालिका है ओ साबुत के अधार पे अपना निर्णय सुनती है भले ही अपराध कितना भी संगीन क्यों ना हो अगर साबुत शंका से परे नहीं होगे तो भारतीय नयायपालिका अपराधी को छोड़ देती है !क्यों की भारतीय न्यायपालिक का धेय्य रहता है की "एक अपराधी भले बच जाये लेकिंन  किसी बेगुनाह को गलत सजा नहीं होनी चाहिए"!

उपरोक्त बातो से ये पता किसी भी अपराधी को सजा दिलाने में साबुत की बहुत ही अहम् रोल होता है और ओ भी ऐसा साबुत जो बियॉन्ड डाउट हो जिसपे थोडा भी शक  नहीं किया जा सके !इसलिए ये एक Investigating Officer का जिम्मेवारी है की वो एविडेंस को प्रोफेसनली कलेक्ट करे और अपराधी को उपयुक्त सजा दिलाये.
लेकिंग एविडेंस कलेक्ट करते समय एक Investigating Officer क्या क्या गलतिय कर सकते है उन गलतियों की कुछ एक मै लिस्ट आउट करने का कोशिश किया हु जो की बहुत सरे ट्रेनिंग मटेरियल और I.O. के personal अनुभव के अधर पे है :
1.             फौल्टी या डिलेड  एविडेंस प्रिजर्वेशन ऑफ़ सिन  ऑफ़ क्राइम (Faulty or delayed evidence preservation at scene of crime)

·                     Scene of crime पे जल्द से जल्द नहीं पहुचना !देर से पहुचने के कारण बहुत से फिजिकल एविडेंस को नष्ट होने की संभाना रहता है !
·                     अपराध घटना के जगह को अच्छी से preserve नहीं करना जिससे की चांस रहता है की घटना के जगह पे उपलब्ध साबुत को नष्ट करना या नया साबुत प्लांट करना !
·                     अगर घटना स्थल को अच्छी तरह से preserve नहीं किया गया तो जाने अनजाने में साबुत I.O. के हाथ या पैर से नष्ट होने के सम्भानाये रहती है या वह पे उपलब्ध भीड़ के चहल कदमी के कारन भी फिजिकल एविडेंस नष्ट होने की सम्भानाये रहती है !
     2. फौल्टी एग्जामिनेशन ऑफ़ सिन ऑफ़ क्राइम:(Faulty examination of scene of crime)


·                     सिन ऑफ़ क्राइम को एक्सामिन करते हुवे रबर ग्लोवे का नहीं पहने से इसकी सम्भानाये रहती है की I.O की खुद की फिन्गर प्रिंट या और कोई बायोलॉजिकल मार्क वह छुट जाये जो की पुलाब्ध एविडेंस को शंकयुक्त बना दे !
      3.फौल्टी लिफ्टिंग ऑफ़ एविडेंस (Faulty lifting of evidence)

·                     साधारणतः  देखा गया है की फिंगर प्रिंट, फूट प्रिंट,और टायर मार्क को प्रोफेसनल तारिक के से नहीं लिफ्ट किया जाता है  और प्रोफेसनल तरीके से नहीं उठाने के कारन बहुत से वाइटल एविडेंस या तो नष्ट हो जाते है या छुट जाते है !
·                     खाली केस और फिंगर प्रिंट को सही समय पे फोरेंसिक लैब में  जाँच और प्रिजर्वेशन के लिए नहीं भेजने से  कोर्ट के मन में शंका पैदा होता है की अपराधी के पकड़ने के बाद का लिया हुवा फिंगर प्रिंट है!

      4. फौल्टी पैकिंग (Faulty packing of evidence)

·                     बहुत बार देखा गया है की सिन ऑफ़ क्राइम से एविडेंस तो लिफ्ट किया गया लेकिंग डॉक्यूमेंटेशन सही नहीं क्या गया सभी एविदेंसस पे एफ आई आर नॉ नहीं लिखा गा है और अगर लिखा गया है तो उसके ऊपर बहुत करेक्शन किया हुवा है ! ये अब फौल्टी पैकिंग में आता है और ऐसे एविडेंस को कोर्ट शक के निगाह से देखती है !
      5. फौल्टी स्केत्चिंग (Faulty preparation of crime scene map)

·                     सिन ऑफ़ क्राइम का जो  माप बनाया जाता है ओ इतना छोटा रहता है और प्रोपेर्ली  ड्रा नहीं किया रहता है 
·                     सिन ऑफ़ क्राइम के आसपास उपलब्ध लैंडमार्क को नक्से में नहीं दर्शाया रहता है जिसके करन क्राइम और उपलब्ध एविडेंस को बाद में कोरिलेट  करना मुश्किल हो जाता है !
·                      सिन ऑफ़ क्राइम का जो माप बनाया गया है उसमे डायरेक्शन को नहीं दिखना !
        6. फौल्टी फोटोग्राफी या विडीओग्रफी (Faulty or delayed photograghy or videography)


·                     ये I.O का दायित्व है की ओ सिन ऑफ़ क्राइम पे पहुचने के बाद सबसे पहले उस जगह की फोटोग्राफी और विडीओग्रफ़ि  कराये लेकिन बहुत बार इस काम को लास्ट में किया जाता है जो की गलत  है क्यों की बहुत से एविडेंस है ओ गर्मी, हवा या नमी के कारन नष्ट ही जाने की सम्भाये रहती है इसलिए सिन ऑफ़ क्राइम का फोटोग्राफी या विदिओग्रफ़ि जरुर कराये.

ड्रिल का इतिहास और सावधान विश्राम पोजीशन में देखनेवाली बाते

ड्रिल का इतिहास और सावधान विश्राम पोजीशन में देखनेवाली बाते

सिविलियन और वर्दीधारी के बीच फर्क जो देखने को मिलता है वो उसका मुख्य कारण होता है परेड ड्रिल ! क्योंकि परेड ड्रिल एक ऐसा विषय है जो एक वर्दीधारी को सिखाया जाता है लेकिंन सिविलिन को नहीं ! परेड ड्रिल में एक वर्दीधारी केवल लेफ्ट राईट यानि परेड करना ही नहीं सिखाया जाता है वल्कि उसको किसे यूनिफार्म पहना चाहिये, कैसे चलना बात करना, कैसे वरिष्ठ अधिकारी से बात करते है या आदेश लेते है और कैसे अपने से जूनियर को आदेश देते है या बात करते है इत्यादि सिखलाया जाता है यानि हम ये कह सकते है की जो एक वर्दीधारी का विशेष इमेज आप पब्लिक में बना हुआ है जैसेकि वो ड्रिल के दौरान दी गयी अनुशासन और सही, समय पर ईमानदारी से काम करने का सिखलाया जाता है उन सब का जीवन में अपना अहम स्थान रहता है !
  ड्रिल फ़ौज में कब शरू हूवी ?
सबसे पहले ड्रिल को फ़ौज में शुरु करने वाले थे जर्मन में मेजर जनरल डराल ने सान( Dral ne San) जो इसे सान 1666 में शुरु किये ! उनका सोच था की फ़ौज को कण्ट्रोल करने, अनुशाषित रखने, हुकुम मानने तथा सामूहिक रूप से काम के लिए कोई न कोई तरीका होने चाहिए और जो तरीका उन्होंने ड्रिल को अमल में लाया !
 ड्रिल किसे कहते है ?
किसी प्रोसीजर को क्रमवार और उचित तरीके अनुकरण करने की करवाई को ड्रिल कहते है ! इसका मतलब ये हुवा की परेड ग्राउंड में परेड  करने को ही हम ड्रिल नहीं कहेंगे बल्कि ड्रिल उन सभी कार्यवाही को कहते है  जो क्रमवार और उचित तरीके से किया जाता हो !
 ड्रिल कितने प्रकार के होते है ?
ड्रिल दो प्रकार के होते है !
(i)                   ओपन ड्रिल ये ड्रिल फील्ड में की जाती है
(ii)                 क्लोज ड्रिल ये ड्रिल ट्रेनिंग ग्राउंड / पीस एरिया में की जाती है
 ड्रिल का उद्देश्य क्या होता है ?
एक सैनिक के अन्दर आदेश मानने और अपने कर्तव्य के प्रभाव को अंजाम देने के लिए हर समय सजग रहने का मज़्दा पैदा करना!
 ड्रिल के फौजी के ऊपर क्या असर डालता है?
जैसे की कहा गया है की ड्रिल डिसिप्लिन का बुनियाद है और ड्रिल एक फौजी को सिविलिन से फौजी बनता है! ड्रिल का असर कुछ निम्नलिखित है
(i)                   डिसिप्लिन सिखलाती है!
(ii)                 सामूहिक रूप में काम करने की आदत डालती है!
(iii)                आदेश मानने की आदत सिखलाती है!
(iv)                कमांड एवं कण्ट्रोल सिखलाती है
(v)                 सही तरीके से यूनिफार्म पहनना सिखलाती है!
(vi)                ड्रिल देख कर किसी यूनिट का डिसिप्लिन और मोरल का अंदाजा लगाया जा सकता है !
ड्रिल के उसूल क्या होते है ?
ड्रिल का उसूल होता है :
(i)                   स्थिरता (Steadiness)
(ii)                 फूर्ती (Smartnes)
(iii)                मिलकर कम करना (Coordination)
 फूट ड्रिल के क्या उसूल होते है?
फूट ड्रिल के उसूल :
(i)                   पाँव तेजी से आगे निकलना (Shoot the foot forward)
(ii)                 घुटने को तेजी से झुकना (bend the Knee double time)
(iii)                ठीक वफ़ा देना (Correct Pause)
ड्रिल देने के लिए ट्रेनिंग एड्स क्या क्या है ?

निम्नलिखित है :
(i)                   पेस स्टिक
(ii)                 बैक स्टिक
(iii)                एंगल बोर्ड
(iv)                समय सूचक (मेट्रोनोमे)
(v)                 ड्रम और ड्रमर
सावधानकी जरुरत और सावधान पोजीशन में देखनेवाली बाते क्या है?
सावधान की जरुरत ड्रिल के कोई भी हरकत करनी हो तो वो सावधान पोजीशन से की जाती है और अपने से सीनियर से बात करनी या आदेश लेते समय सावधान पोजीशन को अख्तियार कर के ही की जाती है!
सावधान पोजीशन में देखनेवाली बाते : दोनों पैर की एड़िया मिली हवी और पौंजो का एंगल 30 डिग्री ! दोनों घुटने टाइट ! दोनों बाजु दाहिने और बाये तरफ पैंट की सिलाई के साथ मिले हुवे और मुट्ठी कुदरती तौर पे बंद ! पेट अन्दर के तरफ और छाती बहार के तरफ उट्ठी हवी ! कंधे पीछे खिचे हुवे और गर्दन कोलार के साथ मिली हवी और निगाह सामने !
 "सावधान" पोजीशन में दोनों पौंजो के बिच कितना डिग्री का एंगल होता है ?
दोनों पंजो के बिच 30 डिग्री का एंगल होता है !
      
 विश्राम की जरुरत और विश्राम पोजीशन में देखनेवाली बाते क्या है ?

ड्रिल की कोई भी करवाई ख़त्म होने पे विश्राम पोजीशन की कारवाई करते है या सीनियर से बात ख़त्म होने पे विश्राम की करवाई करते है !
ये परेड ड्रिल का शुरुवात की कुछ कारवाहियाँ सिखलाई जाती है !